
सुनो.. तुम कुछ सुनना मत…
जब भी अपनी तन्हाइयों में
मैं तुम्हें याद करके
जो कहूं तुम्हारे कानों में
वो तुम बिल्कुल भी मत सुनना
ये भी न सुनना कि तुम्हारी नज़र से
जो मुझपर पड़ती है और जिस तरह पड़ती है
ये तुम न जानो तो ही अच्छा है ..
वरना तुम्हारी उस नज़र का सामना
कैसे करुँगी .. पता नही..
अच्छा ये भी न सुनना कि जब भी
तुम मेरे पास से गुज़रते हुए
जान बूझ के हल्का सा छूते हुए जाते हो
तो जो रेशमी सा एहसास होता है
वो कितना प्यारा है मुझे..
लगता है या तो तुम रेशम हो या मैं
या हम दोनों ही मुलायम से हो गए हैं
तुमने सुना तो फिर मेरी जान
मेरे रेशमी पैराहन से फिसल जायेगी
कभी कभी ख़ुद को ये भी बताती हूँ
कि तुम जब मेरी और नही देखते
तो मैं तुम्हारे करीब वैसे ही आती हूँ
जैसे कि तुम मेरे करीब आ जाते हो..
जब मैं तुम्हें नही देख रही होती…
तुम्हारे कानो में ये बात पड़ी तो
लुका छिपी कैसे खेलूंगी मैं
और फिर ये बात तो बिल्कुल न सुनना
कि तुम्हारी छुअन से जो जल तरंग
मेरे जिस्म में बजने लगते हैं
वो मुझे तुमसे तुम बनाते रहते हैं
कितना सुंदर महसूस करती हूँ मैं
जब तुम बन जाती हूँ और फिर भी तुमको
अपने सामने पाती हूँ..
तुम ये न सुनना ..मैं शर्मा जाउंगी..
कभी बाल उड़ते हैं तो
तुम्हारे चेहरे को ही ढूँढते हैं
मुझे पता है मैंने पूछा था उनसे
मेरे दुपट्टे तो तुम्हारी उँगलियों बिना
बड़ा सूना सा महसूस करते हैं..
तुम्हारे आगे जैसे भी रहती हूँ
जैसे भी महसूस करती हूँ
तुम्हारे पीछे से नहीं करती
हाँ वो सब पल हर लम्हा जीती ज़रूर हूँ
मगर तुमको नही बताना ये सब
सुनो .. तुम न ही सुनो …
मेरी तन्हाईयों में कभी आओ तो
खैर हमेशा तो रहते हो..
फिर भी सच्ची मुच्ची में आओ तो
ये बातें न सुनना..
जब तुम नही होते हो तब..
तुमको जीने के लिए ये सब बातें
बचा के रखती हूँ.. क्यूंकि तब लगता है कि
तुम मेरे पास ही हो..मेरी आगोश में..
इसीलिए सुनो.. तुम कुछ भी सुनना मत...
1 comment:
kuch bhi nahi sunaa ji...
:*
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