Thursday, July 9, 2009

बैथा



कोई कहे मोहे का से कहूं मैं......

मन् जब होवे धीर अधीर.....

हूँ हूँ मारे सांस न आवे

पी की बाट में होई अधीर

कैसे कहूं मैं तोसे मोरे प्रीतम

आन मिलो मैं तो होयी अधीर

हमरी बैथा तुमरी भी है......

तुमरी बैथा हमरी है पीर



खाली नेहा खाली निंदिया

खाली खाली सपन लगे

रात कटे न भोर पड़े न

तडपूँ पल पल नीर बहे

का से कहूं मैं बिरहा की मारी....

आके गरवा लगा लो जी ....

पल पल कट के पल कम होवे

पल पल ह्रदय में करते हैं चीर


गुम सुम सी मैं फिरती हूं जी

चुप चुप से अधरों के बीच

चाप चाप मैं घडियां बिताऊं

आस आस कभी खीज खीज

का से कहूं मैं बावरी पगरी

नैनं सागर मन् भये है झील

प्रीतम के दरसन न होवें

न इस तीर न ही उस तीर



लाल लाल जग दिसे है मोहे

कानन में बाजे सहनाई

हार जो गर में डारे प्रीतम

लागूँ जैसे भई बिहाई

जाने कौन से देस मा खोयी

मीरा बनी मैं ठाकुर जी ...

भेजो कहार या आप ही आओ

जल्दी बढ़ाओ समय समीर

कोई कहे मोहे का से कहूं मैं..

मन् जब होवे धीर अधीर..

हूँ हूँ मारे सांस न आवे

पी की बाट में होई अधीर

कैसे कहूं मैं तोसे मोरे प्रीतम

आन मिलो मैं तो होयी अधीर

हमरी बैथा तुमरी भी है ..

तुमरी बैथा हमरी है पीर

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