खामोशी

खामोशी तीन तरह की होती है.
एक वो जिसमें होने वाली
बातों का तक़ाज़ा होता है.
जैसे दूर से एहसास हो जाता है
पटरी पे कान रखने से,
कि रेल गाड़ी आने वाली है.
और एक वो जिसमें,
हो चुकी बातें गूँजती रहती हैं.
जैसे जागके ऊंघती सहेर के कानों में,
रात का गुम्मा गूँजता है.
लेकिन हो चुकी और होने वाली बातों के
बीच की भी एक खामोशी पलती है!
कभी सिफ़र सी लगती है.. और कभी सफ़र.....
3 comments:
very nice thought, keep it up, expecting more from u.
bye
tc
behtareen comparison... train aur patree walaa specially.. a very compact and mature creation... u end up smiling and looking in "sifar" while reading it...
kafi sifar si lagti hai kabhi safar si....
:)
:)
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