Tuesday, January 15, 2008

मेरा जहाँ



कौन कहता है कि दिन पहाड़ जैसा है..

ज़िंदगी पहाड़ जैसी है
गुज़ारा मुश्किल होगा!
कैसे बसर होगाक्या क्‍यूँ कर होगा!
मेरी मानो तो ज़रा मेरी नज़र
उधार लेकर देख लीजो
ज़िंदगीदिनवक़्तसाँसेंइंतज़ार
ये सब कुछ हाँ सभी कुछ
समंदर है आसमाँ है रेगिस्तान है
ये सब कुछ हाँ सभी कुछ
थक जाते हो ना चलते चलते
नाव खेते खेतेसब्र लिए उड़ते-बहते
लेकिन फिर भी सफ़र ख़त्म नही होता..
"कुछ दूर और चल के देखो"
यही खुद को कहते हैं सभी,
"बस दो कदम और चलोथोड़ी दूर और"
किस्मत हो तो चाँद दोस्त बादल जैसे
कभी मिल जाते हैं रुक कर दम लेने को
नही तो खेते रहते हैं सभी
सब्र कि नाव इंतज़ार के समंदर में
हाँ बवंडर भी आते हैं
बावाले भी हो जाते हैं कुछ लोग
क्या करें राह में सराब तो होगा ही..
रेत में अज़ाब तो होगा ही..
खैर.. पहाड़ ना कहना अब इनमें से किसी को..
मुझे कभी किसी का शिखर नही मिला
मोड़ मिले हैं लेकिन बड़े सपाट होते हैं..
फट से मुड जाते हैं!!
हाँ थोड़े उबड़ खाबड़ से होते हैं
जैसे लहरें .. जैसे हवा..जैसे रेत के गड्ढे..
मैं 22 मील तय कर चुकी..
मेरी मंज़िल तो जैसे
साए कि तरह मेरे साथ चलती है..
हाँ ये वही सराब है!
और अज़ाब भी देख चुकी..
बावली भी हो चुकी..
बादल भी मिले कई..
और कहीं कहीं दम भी फूला पर कोई ना मिला...
मेरा हाथ थामने वाला कोई ना था....
जो था वो सब सराब था..
समंदर के क्षितिज के जैसा
आसमा के छोर के जैसा और
रेत में पानी जैसा
सब सराब... मगर सुनो!
मुझे रुक के घर बनाने को ना कहना
मेरा सफ़र ही मेरी मंज़िल है और
मेरे साथ चलता है उसका साया
वो मेरा सरमाया है हुँसाया है
हमसफ़र है हमराह है वो
फिर वो चाहे सराब ही सही...
जो भी है मेरा अपना तो है!
अपनी नज़र लेके देखोगे तो यकीन ना होगा तुमको
मेरी मानो तो ज़रा मेरी नज़र
उधार लेकर देख लीजो
ज़िंदगीदिनवक़्तसाँसेंइंतज़ार
ये सब कुछ हाँ सभी कुछ
समंदर है आसमाँ है रेगिस्तान है
सब कुछ हाँ सभी कुछ
दिलचस्प है तिलइसमी है रुहानी भी है..
मेरा जहाँ है !!

1 comment:

Shashank said...

Lambi kavitaaon, nazmon mein aksar ek phase aata hai jahaan padhne waala thoda focus lose karta hai, iss kavita ko padhte hue main ek baar bhi aankhe screen se nahi hataa paaya.....
baaki ek shabd ka replacement dhoondhne ki muhim jaari hai [:)]