Thursday, January 17, 2008

किवाड़


मेरा किवाड़ अब बँध नही होता
पहले मैने ही जान बूझ के खुला रखा था
शायद गये लोग भूले से ही  जायें
या फिर किस्मत चमक उठे
और मेरा इंतज़ार फ़ना हो जाए.........
खैरमेरे बर्तन मांझने से चमकते कम ही हैं
जितना घिसो उतनी ही राख हाथ आती है......
किवाड़ पे अब ज़ंग सा कुछ दिखता है.
यूँ तो छज्जा है आगे मेरे हाथ का,
धूप आँधी तूफान से बचाव रहता;
लेकिन कुछ कुछ रिस्ता रहता है इसमें.
अंदर ही अंदर घुल रहा है ये बेचारा...
लाल लाल से रहता है ..बड़ी चिंता होती है.
गल गया तो इसी नाप का और कहाँ मिलेगा?
मरम्मत कौन करेगानिगरानी कौन करेगा?............
मैने फ़ैसला किया है बिना किसी से मश्वरा लिए...
कि अब तो कोई चौखट ना होगी और ना रोशनदान ही..
चारों और दीवार सी होगी मिट्टी कि और,
छत पे मिट्टी सी ही पड़ी रहेगी!
जो घुलता होगा अंदर वो अंदर रहेगा!
और मुझसे बेज़ार बाहर का हर मंज़र रहेगा.
मुझे मेरी दुनिया में कोइ चिंता ना होगी.
ना वक़्त कि फ़िक्र उम्र कि भी परवाह ना होगी
एक किवाड़ ने कितना सताया है मुझको
कम्बख़्त बँध ही नही होता!!!

2 comments:

Anonymous said...

Ossom!!!!!!!!!!!!!!
God Bless U
Moushomi

Shreya said...

koii baat to hai ....