किवाड़
मेरा किवाड़ अब बँध नही होता
पहले मैने ही जान बूझ के खुला रखा था
शायद गये लोग भूले से ही आ जायें
या फिर किस्मत चमक उठे
और मेरा इंतज़ार फ़ना हो जाए.........
खैर, मेरे बर्तन मांझने से चमकते कम ही हैं
जितना घिसो उतनी ही राख हाथ आती है......
किवाड़ पे अब ज़ंग सा कुछ दिखता है.
यूँ तो छज्जा है आगे मेरे हाथ का,
धूप आँधी तूफान से बचाव रहता;
लेकिन कुछ कुछ रिस्ता रहता है इसमें.
अंदर ही अंदर घुल रहा है ये बेचारा...
लाल लाल से रहता है ..बड़ी चिंता होती है.
गल गया तो इसी नाप का और कहाँ मिलेगा?
मरम्मत कौन करेगा? निगरानी कौन करेगा?............
मैने फ़ैसला किया है बिना किसी से मश्वरा लिए...
कि अब तो कोई चौखट ना होगी और ना रोशनदान ही..
चारों और दीवार सी होगी मिट्टी कि और,
छत पे मिट्टी सी ही पड़ी रहेगी!
जो घुलता होगा अंदर वो अंदर रहेगा!
और मुझसे बेज़ार बाहर का हर मंज़र रहेगा.
मुझे मेरी दुनिया में कोइ चिंता ना होगी.
ना वक़्त कि फ़िक्र उम्र कि भी परवाह ना होगी
एक किवाड़ ने कितना सताया है मुझको
कम्बख़्त बँध ही नही होता!!!
2 comments:
Ossom!!!!!!!!!!!!!!
God Bless U
Moushomi
koii baat to hai ....
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