दिल....

एक लम्हे पे रुका है
दिल मेरा ये मनचला है
ना तो मंज़िल ना रास्ता है
फिर कहाँ को बढ़ चला है
क्या जाने कब शब बुझी और
क्या जाने कब दिन ढला है...
ऑस बनकर जो गिरा था
धूप का जो इक सिरा था
दिलनशीं वो गुल सिताँ था
क्या कहें पर सब धुआँ था...
खाब के टूटे रेशे बुनता है ये पगला
औढ के फिर वो पैराहन
बादलों में जा बसा है
आँखों में एक आस सी और
दिल में डर का ज़लज़ला है...
वक़्त को तो गुज़रने दे
जी ले या फिर तू मरने दे
साँसों के गुंजल को खोलो
दिल की सारी बातें बोलो
दिन को भी रात में ही क्यूँ गिनता है ये पगला
उंघति सी ज़िंदगी में
कोई तो इक वलवला हो
साथ कोई हमसफ़र हो
ना भी हो क्या खला है...
एक लम्हे पे रुका है
दिल मेरा ये मनचला है
ना तो मंज़िल ना रास्ता है
फिर कहाँ को बढ़ चला है
क्या जाने कब शब बुझी और
क्या जाने कब दिन ढला है.....
2 comments:
oos bankar jo giraa tha
dhoop ka jo ik siraa tha
all I have to say is a big WOW
:)
unhgati si zindagi mein
koi to ik walwalaa ho
saath koi hamsafar ho
na bhi ho kya khalaa hai...
Hamsafar aur walwalaa... mind blowing...
Ye geet/nazm to nahi hai.... Navgeet keh sakte ho... us lihaaz se achcha hai...
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