मेरा कमरा मुझसे खफा रहता है आजकल, रोज़ जब कदम अन्दर रखती हूँ या फिर बाहर रखूं,
मुझे गुस्साई नज़रों से घूरता है और फिर
चादर में मुंह छिपाकर दिन भर पडा रहता है
मेज़ भी कुछ भरा भरा सा रहता है
जब भी इसका सहारा लेती हूँ,धूल दिखाता है,
और खामोश नज़रों से कई अनकहे सवाल करता है
उकताए परदों में से धूप कुछ यूँ बिखरती है जैसे,
पुरानी पतलून की फटी जेब से सिक्के गिर जाते हैं ज़मीन पर.
काम बहुत है मैं बहाना बना देती हूँ और ..... ये सुन लेते हैं
यह सब जानते हैं की मुझे भी आजकल अपने होने की ख़बर नही है
शायद तभी गुस्सा नही तरस दिखाते हैं सभी मुझ पर.
हाँ एक हमसुखन घड़ी है जो वक्त के गुजरने का एहसास तक नहीं होने देती
अब भी ऐसा लगता है की तुम बस अभी गए हो यहाँ से
अभी तो मैंने एल्बम के पन्ने पलटे थे यहाँ पर
(हालां की इस बात को गुज़रे महीने हो गए)
पर बिस्तर पर अब भी एल्बम रखने से पड़ी सिलवटें दिखती हैं
एक करवट लूंगी और सभी तसवीरें मुड जायेंगी.
अब हर शब को सेहर में बदलती हूँ कोने में पड़े पड़े,
और सूरज को अपनी बालकनी में उगाती हूँ आजकल.
शायद तुम्हारी कमी की सीलन किसी तरह सूख जाए
ताकि तुम मेरे कमरे, होश-ओ-हवाज़ से धुआं हो जाओ
और मैं अपनी जिंदगी को अपना हक अदा कर सकूं.......
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