किसी पहाड़ के सिरे में ढलता हुआ सा
या शायद किसी समंदर किनार उफ़क़ पे फिसलता हुआ सा
एक खूबसूरत सा सनसेट है वो
न छुआ उसे कभी न नज़र ही मिलायी कभी
न करीब उसके मैं गयी न पास वो आया कभी
हाँ उगता हुआ सा दिखा था वो एक दिन
किसी हिल स्टेशन पर होटल कि बालकनी से जैसे
कोई टूरिस्ट अंगड़ाई लेता हुआ सुबह
बस यूं ही मुस्कुरा देता है सूरज पर
बस तब से एक अजीब सा रब्त है उससे
वो एक सिराज जो एक दिन रात में दिखा था उगते हुए
कई बरस बीत गए मगर वो ढल तो रहा है मगर ढलता क्यूँ नहीं
कभी बस ठहर कर मैं देखती हूँ कि शायद बेहद बेहिस है इसकी रफ़्तार
के डूब तो रहा है मगर डूबता लगता नहीं
कभी लगता है कि बस शाम पर ही स्टेचू हो गया है उस सनसेट के किस्से का वक़्त
न रात आएगी इस कहानी में कभी
न ही मैं कभी कह पाऊँगी कि रात गयी और बात गयी
सवाल ज़हन में ये है कि इस शाम को स्टेचू किया किसने है
या शायद सवाल ही गलत है
और शायद जो लगा वो भी गलत ही था
शायद ऐसा कुछ है ही नहीं
शायद वक़्त किसी बच्चे कि तरह ड्राइंग बुक में शाम कि पेंटिंग बना रहा था
कि और बीच में ही उसके रंग ख़त्म हो गए
अब न तो वक़्त को ये पेंटिंग याद है न ही इसे पूरा करना ही
जब वक़्त ही एक शाम को शब् करना भूल गया है तो
मेरा भी भूल जाना बेहतर है
कब तक कोई वक़्त को कुछ याद दिलाने कि कोशिश करे
ये वो बच्चा है जिसका मन एक चीज़ से उठ गया सो उठ गया
खैर …
कभी बिस्तर के किसी कोने में कुछ खेलते खेलते ये शाम उसे मिली तो
शायद इसकी पेंटिंग पूरी कर देगा या कुछ और बिगाड़ देगा इसे या शायद फाड़ ही देगा
फाड़ दे तो ही अच्छा है।

No comments:
Post a Comment