Friday, December 17, 2010

Singapore.




तैरती ये कश्तियाँ है..

जलती बुझती बस्तियां हैं..

ये भी बुत परस्तियाँ हैं..



इक सिफ़र से जागे ..

दर उठा के भागे..

किस सफ़र में जाने..

हैं ये घर बसाने..

कि अजब गृहस्तियाँ हैं..



क्रेन से अटकाके

आसमाँ में झांके

बल्ब कों जलाके

खुद ही टिमटिमाते

जाने कैसी हस्तियाँ हैं...



खींच के बादलों कों

अपने सर कों ढकते हैं...

बारिशों में भीग कर..

घर बचाए फिरते हैं

नाम की बस मस्तियाँ हैं..



आँखें छोटी छोटी हैं..

ख्वाहिशें पर मोटी हैं..

हड्डियों के गट्ठे में

कैद बोटी बोटी है..

दफन मांसपेशियाँ हैं...



तैरती ये कश्तियाँ है..

जलती बुझती बस्तियां हैं..

ये भी बुत परस्तियाँ हैं..



1 comment:

दिव्यांशु शर्मा said...

hmmmm... a tribute to singapore ? :)

किस सफ़र में जाने..हैं ये घर बसाने..
.... ye line sateek lagee...is ka aaga peecha naa bhi pata ho to bhi sampoorna hai... :)