तुम्हारे बाईं तरफ़ चलना हो या
खाना ठीक से खाना हो
तुम्हारे साए में घर पहुंचूँ या
पास तुम्हारे आना हो
एक तुम्हारा ही हक है मुझ पर...
कभी जतलाओ न!
एक निगाह से डर जाऊं मैं,
ऐसा कितनी बार हुआ है.
बच्चों जैसी बन जाऊं मैं,
ऐसा कितनी बार हुआ है.
हर इशारे पर तुम्हारे,
मुझे नाचना गाना हो.
तुम्हारे साए में घर पहुंचूँ या,
पास तुम्हारे आना हो.
एक तुम्हारा ही हक है मुझ पर........
कभी जतलाओ न!
दायाँ हाथ पकड़ के मेरा,
पास अपने बिठा लो ना.
या फिर बायाँ हाथ थाम के,
साथ अपने चला लो ना.
तुम्हारा मुझे संभालना हो या,
मेरा लडखडाना हो.
तुम्हारे साए में घर पहुंचूँ या,
पास तुम्हारे आना हो.
एक तुम्हारा ही हक है मुझ पर.......
कभी जतलाओ न!
एक हक मुझसे और भी ले लो!
जब ज़रा सी पलकें मेरी,
चमकीली सी लगने लगें.
और बातें मेरी सारी ही,
अटपटी सी लगने लगें.
पूछने पर तुम्हारे गर में,
एकदम से चुप हो जाऊं.
और फिर पास से मैं तुम्हारे,
उठ कर कही चली जाऊं.
खींच के दामन मेरा तुम फिर ,
ज़ोर से गले लगा लेना.
रो भी पडूँगी मैं फिर उस दिन,
और तुम चुप करा देना.
दिल की बात बताना हो या,
मजबूरी समझाना हो.
तुम्हारे साए में घर पहुंचूँ या,
पास तुम्हारे आना हो.
एक तुम्हारा ही हक है मुझ पर...........
कभी जतलाओ न!
3 comments:
Wah!! ustad Wah!!
Keep it Up
Luv u
Moshmi
haq jiske bhi ho..par sans tumhari ho...
prerna bane koi bhi...par baat tumhari ho.....
parchai tum bhale ho uski....
par pehchaan tumhari ho...
haq dena usse hi..
jiska jism bhale hi alag ho...
par dhadkan tumahri ho!!!
u r wonderful..!!
vidushi
mazeydaar.. :)
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