कि जब भी मैं गले लग के तुम्हारे चैन लेती हूँ
तुम्हारी धड़कनें उठ उठ के बोसा देती हीं रुख़ पे
यकीन तब दिल को आता है कि मैं तुम्हारी जान हूँ जानम..
तुम्हारे जिस्म को अब दिल के मेहमान भा रहा है और..
यही की मैं तुम्हारी ही रगों और नब्ज़ में शामिल हो रही हूँ..
तुम्हारी आती जाती सासों में खनकती हूँ तो लगता है
तुम्हारी रूह में अब घर मेरा बसने लगा है..
कि जब भी मैं गले लग के तुम्हारे चैन लेती हूँ..
तुम्हारी धड़कनें उठ उठ के बोसा देती हीं रुख़ पे
यकीन तब दिल को आता है की मैं तुम्हारी जान हूँ जानम..
यकीन होता है कि जिस्मों जान कैसे एक होते हैं..

1 comment:
Sundar... par inta kam kyon ... 2010 mein sirf 5... ghor anyaay !!!
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